Friday, December 7, 2007

वो चंद लम्हे...

तू चाहे हाँ कर , चाहे तू ना कर
रखूँगा मैं अपने दिल में सजाकर
वो चंद लम्हे ...

तू ही बता दे कैसे
बयाँ करूँ मैं हाले दिल
उलझन में ये दिल है
दिल में बड़ी मुश्किल
मैं तो चाहूँ यही बस
तुम छू लो हाथ बढ़ाकर
वो चंद लम्हे ...

आज बैठ फिर तन्हाई में
सोचता हूँ मैं गुमसुम
काश आज फिर क़यामत हो
और मिल जाओ मुझे तुम
डरता हूँ , लहरें वक़्त की
ले जाएँ न बहाकर ,
वो चंद लम्हे ....

मेरी मोहब्बत को तुम
अब और ना तड़पाओ
या तो पकड़ लो हाथ मेरा
या फिर चले जाओ
लेकिन ये भूल ना जाना ,
जाना मुझे लौटाकर
वो चंद लम्हे ...


चला जाऊँगा दूर मैं तुमसे
लौटकर फिर नहीं आऊंगा
लेकिन तुम भी ये जान लो
भूल तुम्हें नहीं पाऊँगा,
ले जाऊँगा आँसुओं कि तरह
इन पलकों में छिपाकर
वो चंद लम्हे ...


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